भूकंप का भूगोल Earthquake Information

Lavakush Kumar
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भूकंप का भूगोल Earthquake

भूगर्भशास्त्र की एक विशेष शाखा, जिसमे भूकम्पो का अध्ययन किया जाता है. सिस्मोलाजी कहलाता है. भूकंप का भूगोल -भूकंप की तीव्रता की माप रिक्टर पैमाने पर की जाती है.




भूकंप का भूगोल में प्रारम्भिक तरंग Primary Wave

यह तरंग पृथ्वी के अन्दर प्रत्येक माध्यम से होकर गुजरती है, इसकी औसत वेग आठ किमी प्रति सेकंड होती है. यह गति सभी तरंगो से अधिक होती है. जिससे ये तरंगे किसी भी स्थान पर सबसे पहले पहुँचती है.

 

भूकंप का भूगोल में द्वितीय तरंग Secondary Waves

इन्हें अनुप्रस्थ तरंगे भी कहते है. यह तरंग केवल माध्यम से होकर गुजरती है. इसकी औसत वेग चार किमी प्रति सेकंड होती है.

 

भूकंप का भूगोल में एल तरंगे L-wave

इन्हें धरातलीय या लम्बी तरंगो के नाम से भी पुकारा जाता है. इन तरंगो की खोज H.D. Love ने की थी. इन्हें कई बार Love waves के नाम से भी पुकारा जाता है. इनका अन्य नाम R-waves Ray Light Waves है. ये ठोस तरल तथा गैस तीनो माध्यमो में से गुजर सकती है. इसकी 1.5-3 किमी प्रति सेकंड है.

भूकंपीय तरंगो को सिस्मोग्रफ Seismograph नामक यंत्र द्वारा रेखांकित किया जाता है. इससे इनके व्यवहार के सम्बंध में निम्नलिखित तथ्य निकलते है.

सभी भूकम्पीय तरंगो का वेग अधिक घनत्व वाले पदार्थो में से गुजरने पर बढ़ जाता है. तथा कम घनत्व वाले पदार्थो में से गुजरने पर घट जाता है.

केवल प्राथमिक तरंगे ही पृथ्वी के केन्द्रीय भाग से गुजर सकती है. परन्तु वहाँ पर उनका वेग कम हो जाता है.

गौण तरंगे द्रव पदार्थ में से नहीं गुजर सकती.

एल तरंगे केवल धरातल के पास ही चलती है.

विभिन्न माध्यमो में से गुजरते समय ये तरंगे परावर्तित तथा आपर्तित होती है.

 

 

पृथ्वी का केंद्र

भूकंप के उद्भव स्थान को उसका केंद्र कहते है. भूकंप के केंद्र के निकट P,S तथा L तीनो प्रकार की तरंगे पहुँचती है. पृथ्वी के भीतरी भागों में ये तरंगे अपना मार्ग बदलकर भीतर की और अवतल मार्ग पर यात्रा करती है. भूकंप केंद्र से धरातल के साथ 11000 किमी की दूरी तक P तथा S तरंगे पहुँचती है. केन्द्रीय भाग कोर पर पहुँचने पर S तरंगे लुप्त हो जाती है. P तरंगे अपवर्तित हो जाती है. इस कारण भूकंप के केंद्र से 11000 किमी के बाद लगभग 5000 किमी तक कोई भी तरंग नहीं पहुँचती है. इस क्षेत्र को छाया क्षेत्र Shadow Zone कहा जाता है.

 

अधिकेन्द्र Epicentre

भूकंप के केंद्र के ठीक ऊपर पृथ्वी की सतह पर स्थित बिंदु को भूकंप का अधिकेन्द्र कहते है.

अंत: सागरीय भूकम्पो द्वारा उत्पन्न लहरों को जापान में सुनामी कहा जाता है.

विभिन्न स्थला कृतियाँ निर्माण के आधार पर स्थलाकृतियाँ मुख्यतः तीन प्रकार की होती है – पर्वत, पठार, मैदान

 

पर्वत – उत्पत्ति के अनुसार पर्वत चार प्रकार के होते है.

ब्लाक पर्वत Block mountain – जब चट्टानों में स्थित भ्रंश के कारण मध्य भाग नीचे धँस जाता है. तथा अगल-अलग बगल के भाग ऊँचे उठे प्रतीत होते है, तो ब्लाक पर्वत कहलाते है. बीच में धंसे भाग को रिफ्ट घाटी कहते है. इन पर्वतों के शीर्ष समतल तथा किनारे तीव्र भ्रंश कंगारो से सीमित होते है. इस प्रकार के पर्वत के उदाहरण है वास्जेस फ्रांस, ब्लैक फारेस्ट जर्मनी, विंध्याचल और सतपुड़ा भारत, साल्ट रेंज पाकिस्तान. विश्व की सबसे लम्बी रिफ्ट घाटी जार्डन नदी की घाटी है, जो लाल सागर की बेसिन से होती हुई जेम्बजी नदी तक 4800 किमी लम्बी है.

 

भूकंप का भूगोल

अवशिष्ट पर्वत Residual Mountain

ये पर्वत चट्टानों के अपरदन के फलस्वरूप निर्मित होते है, जैसे नीलगिरी, पारसनाथ, राजमहल की पहाड़ियाँ भारत, सीयरा स्पेन, गैसा और बूटे अमेरिका.

 

संचित पर्वत Accumulated Mountain

भूपटल पर मिटटी, बालू, कंकर, पत्थर. लावा के एक स्थान पर जमा होते रहने के कारण बनने वाला पर्वत. रेगिस्तान में बनने वाले बालू के स्तूप इसी श्रेणी में आते है.

 

वलित पर्वत Fold Mountain

ये पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों से धरातल की चट्टानों के मुड जाने से बनते है. ये लहरदार पर्वत है, जिनपर असंख्य अपनतियाँ और अभिनितियाँ होती है. जैसे – हिमालय, आल्पस, यूराल, राकीज, एंडीज आदि.

वलित पर्वतों के निर्माण का आधुनिक सिन्धांत प्लेट टेक्टोनिक Plate Tectonics की संकल्पना पर आधारित है.

जहाँ आज हिमालय पर्वत खड़ा है वहाँ किसी समय में टेथिस सागर नामक विशाल भू-अभिनति अथवा भू-द्रोणी थी. दक्षिण पठार के उत्तर की और विस्थापन के कारण टेथिस सागर में बल पड़ गए और वह ऊपर उठ गया जिससे संसार का सबसे ऊँचा पर्वत हिमालय का निर्माण हुआ है.

भारत का अरावली पर्वत विश्व के सबसे पुराने वलित पर्वतों में गिना जाता है. इसकी सबसे ऊँची चोटी माउंट आबू के निकट गुरु शिखर है, जिसकी समुद्रतल से ऊँचाई 1722 मी है. कुछ विद्वान अरावली पर्वतों को अवशिष्ट पर्वत का उदाहरण मानते है.

 

पठार Plateau

धरातल का विशिष्ट स्थल रूप, जो अपने आस पास के स्थल से पर्याप्त ऊँचा होता है. तथा शीर्ष भाग चौड़ा और सपाट होता है. सामान्यत: पठार की ऊँचाई 300 से 500 फीट होती है. कुछ अधिक ऊँचाई वाला पठार है – तिब्बत का पठार 16000 फीट, बोलीविया का पठार 12000 फीट, कोलम्बिया का पठार 7800 फीट. पठार निम्न प्रकार के होते है.

अंतपर्वतीय पठार – पर्वतमालाओ के बीच बने पठार.

पर्वतपदीय पठार – पर्वततल और मैदान के बीच उठे समतल भाग.

महाद्वीप पठार – जब पृथ्वी के भीतर जमा लैकोलिथ भूपृष्ठ के अपरदन के कारण सतह पर उभर आते है, तब ऐसे पठार बनते है, जैसे दक्षिण का पठार.

तटीय पठार – समुद्र के तटीय भाग में स्थित पठार.

गुम्बदाकार पठार – चलन क्रिया के फलस्वरूप निर्मित पठार जैसे रामगढ़ गुम्बद भारत.

 

मैदान Plain

500 फीट से कम ऊँचाई वाले भूपृष्ठ के समतल भाग को मैदान कहते है. मैदान अनेक प्रकार के होते है.

 

अपरदनात्मक मैदान

नदी, हिमानी, पवन जैसी शक्तियों के अपरदन से इस प्रकार के मैदान बनते है, जो निम्न है.

 

लोएस मैदान

हवा द्वारा उड़ाकर लाई गई मिटटी और बालू के कणों से निर्मित होता है.

 

कार्स्ट मैदान

चूने पत्थर की चट्टनो के घुलने से निर्मित मैदान.

 

समप्राय मैदान

समुद्र ताल के निकट स्थित मैदान, जिनका निर्माण नदियों के अपरदन के फलस्वरूप होता है.

 

ग्लेशियल मैदान

हिम के जमाव के कारण निर्मित दलदली मैदान, जहाँ केवल वन ही पाए जाते है.

 

रेगिस्तानी मैदान

वर्षा के कारण बनी नदियो दलदली मैदान, जहाँ केवल वन ही पाए जाते है.

 

रेगिस्तानी मैदान

वर्षा के कारण बनी नदियों के बहने के फलस्वरूप इसका निर्माण होता है.

 

निक्षेपात्मक मैदान

नदी निक्षेप द्वारा बड़े-बड़े मैदानों का निर्माण होता है. इसमें गंगा, सतलज, मिसीसिपी के मैदान प्रमुख है. इस प्रकार के मैदानों में जलोढ़ का मैदान डेल्टा का मैदान प्रमुख है.

 

भूमिगत जल द्वारा निर्मित स्थलाकृति

उत्स्रुत कुआँ Artesian well, गीजर, स्टेलेक्टाइट, स्टेलेग्माइट, लैपीज

सागरीय जल द्वारा निर्मित स्थलाकृति – सर्फ, वेला चली, तंगरिका, पुलिन, हुक, लूप, टोम्बोलो.

हिमनद द्वारा निर्मित स्थलाकृति – सर्क, टार्न, अरेट, हार्न, नुनाटक, फियोर्ड, ड्रमलिन, केम आदि.

पवन द्वारा निर्मित स्थलाकृति – ज्युगेन, यारडंग, इनसेलवर्ग, छत्रक, प्लेया, लैगून, बरखान, लोएस.

समुद्री तरंग द्वारा निर्मित स्थलाकृति – समुद्री भृगु, भुजिव्हा, लैगून झील, रिया तट, स्टैक, डाल्मेशियन

वन Forest

वन निम्न प्रकार के होते है –

उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन Tropical Evergreen rain forest – इस प्रकार का वैन विषुवत रेखीय प्रदेश और उष्ण कटिबंधीय प्रदेशों में पाए जाते है. जहाँ 200 सेमी अधिक वर्षा होती है. यहाँ पेड़ों की पत्तियाँ चौड़ी होती है.

 

उष्ण कटिबन्धीय अर्ध पतझड़ वन Tropical semi deciduous froest – 150 सेमी से कम वर्षा प्राप्त करने वाला वन. साल, सागवान और बाँस आदि इसी वन में पाए जाते है.

 

विषुवत रेखीय वन – इन वनों में वृक्ष और झाड़ियों का मिश्रण होता है. जैतून, कोर्क तथा ओक यहाँ के मुख्य वृक्ष है.

 

टेगा वन – ये सदाबहार वन है. इस वन के वृक्ष की पत्तिया नुकीली होती है.

 

टुंड्रा वन – यह बर्फ से ढका रहता है. गर्मी में यहाँ माँस तथा लाइकेन उगते है.

 

पर्वतीय वन – यहाँ चौड़ी पत्ती वाले शंकुधारी वृक्ष पाए जाते है.

घास के मैदान – घास भूमियो को दो वर्गो में विभाजित किया गया है –

उष्ण कटिबंधीय घास भूमियाँ – इसे अलग-अलग देशों में अलग-अलग नाम से जाना जाता है, जैसे सवाना अफ्रीका, कम्पोज ब्राजील, लानोस वेनजुएला कोलंबिया.

 

शीतोष्ण कटिबंधीय घास भूमियाँ – इसे निम्न नाम से जाना जाता है प्रेयरी, पम्पास अर्जेंटीना, वेल्ड दक्षिण अफ्रीका, डाउंस आस्ट्रेलिया, स्टेपी.

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